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अपने बच्चों की अंग्रेजी सुधारने के लिए अच्छे अभिभावक कैसे बने?
ध्यान रहे अगर आप के बच्चों की अंग्रेजी अच्छी नहीं है तो सबसे पहले आपका ही दोष है । इसके बाद वह स्कूल दोषी है । फिर जो टीचर पढ़ा रहा है वह दोषी है। लेकिन चूंकि बालक आपका है आप अगर जागरूक है तो यह समस्या आएगी ही नहीं । आपको अपने बच्चे की भाषा शक्ति को चेक करते रहना है और समय समय पर बच्चे को सपोर्ट देना है।
आइये सबसे पहले इस समस्या को समझ लेते हैं।
ध्यान रहे कि 60 से 90 प्रतिशत तक बच्चों की अंग्रेजी खराब है। अंग्रेजी ख़राब होने के कारण बच्चे का पूरा प्रदर्शन ही ख़राब हो जाता है। उसे गणित विज्ञानं और सामाजिक विज्ञानं समझ में नहीं आते और बालक रटने पर निर्भर हो जाता है। बिना ज्ञान का रट्टू तोता अनपढ़ ही है। इसमें एक और कारण आपके बच्चे को बिगाड़ता है वह है कि स्टूडेंट के अयोग्य होने कि बाद भी उसे अगली क्लास में प्रोमोट करते जाना। स्टूडेंट की क्षमता छोटी कक्षा की होती है पर स्कूल उसे प्रोमोट करता जाता है और पढाई उसके लिए बोझ बनती जाती है क्योंकि उसका बोझ तो बढ़ा क्षमता नहीं बढ़ी। वहीँ दूसरी ओर ऐसा भी हो सकता है कि इंग्लिश माध्यम के स्कूलों में हिंदी में समझा देते हैं। उससे विषय तो समझ में आ जाता है पर छात्र उसे अंग्रेजी में व्यक्त नहीं कर सकता है। इस प्रकार कुल मिलाकर समस्या तो ज्यों का त्यों ही है।
आख़िरकार इंग्लिश माध्यम के स्कूलों में भी बच्चों की इंग्लिश ख़राब क्यों हो जाती है? ऐसा क्यों होता है?
भारत में ज्यादातर बच्चे अपनी मातृभाषा से इतना प्रभावित रहते हैं की मातृभाषा से मोह छोड़ नहीं पाते क्योंकि ज्यादातर समय में वातावरण में मातृभाषा ही होती है और लोग बालक से मातृभाषा में ही बातचीत करना चाहते हैं और बालक भी मातृभाषा में ही बात करना पसन्द करता है । ज्यादा समय बीत जाने के बाद मातृभाषा से प्रेम और भी शक्तिशाली हो जाता है । फिर बालक दो भाषाओँ के बीच में फंस जाता है और दोनों ही भाषाएँ ख़राब हो जाती हैं । चूँकि अंग्रेजी के वाक्य जब वह बनाकर बोलता है तो वे गलत होते हैं और उसे अहसास होता है कि वह गलत अंग्रेजी बोल रहा है । हिंदी या मातृभाषा में उसे ज्यादा आसानी होती है । पर स्कूल में हिंदी में बोलने पर शाबासी नहीं मिलने वाली स्कूल में तो इंग्लिश बोलने पर ही आप का महत्व स्थापित होगा । पर चूँकि हिंदी या मातृभाषा में उसे अधिक पुस्तकें पढ़ने का मौका नहीं मिलता इसलिए हिंदी या मातृभाषा में भी वह कमजोर होता है । हिंदी या मातृभाषा के बहुत सारे शब्दों से को वह नहीं जानता । जब छात्र हिंदी और इंग्लिश दोनों के बीच फंसा होता है तो ऐसे मामलों में छात्र अंग्रेजी वाक्यों की meaning या अर्थ को process नहीं करता और अंग्रेजी के वाक्यों और शब्दों के अर्थ वह गेस करता है या अंदाज लगाता है ज्यादातर अंदाज गलत होता है पर वह गलत अर्थ से ही काम चलाता रहता है । कभी डिक्शनरी देखता नहीं है इसलिए उसका भ्रम दूर नहीं होता । अंग्रेजी से हिंदी डिक्शनरी यहां बहुत काम की होती है पर वह डिक्शनरी नहीं देखता क्योंकि स्कूल का वातावरण उसको अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी को हेय दृष्टि से देखना सिखाता है या हिंदी से घृणा करना सिखाता है । यहाँ बालक द्विभाषाई जाल में उलझ जाता है। जिस भाषा में उसे बोलना अच्छा लगता है उसकी समाज में कोई इज्जत नहीं है और अंग्रेजी के वाक्य जब वह बनाता है तो शब्दों का क्रम बिगड़ जाता है । कुछ शब्द छूट जाते है । कुछ शब्दों की इंग्लिश बनती नहीं है । कुछ बच्चे स्पेलिंग्स मिस्टेक्स बहुत करते हैं । कुछ बच्चे आँख बंद करके कुछ भी बोलते है क्योंकि स्कूल में सिखाया जाता है कि बोलने की प्रैक्टिस करने से इंग्लिश बनने लगती है । इस स्थिति में बहुत से बच्चे फंसे हुए हैं वास्तविक संख्या टेस्ट या सर्वे के बाद ही पता चलेगी चूँकि गावों में भी अंग्रेजी माध्यम स्कूल खुल गए है इसलिए वहां स्थिति और भी ख़राब है । अंग्रेजी माध्यम में लगभग सभी बच्चे हिंदी के वाक्यों की ही तरह अंग्रेजी के वाक्यों में शब्दों का क्रम रखते हैं इस तरह उनके इंग्लिश के वाक्य हिंदी जैसे ही होते है । इस तरह के वाक्य गलत होते हैं पर उन्हें ही सही मान कर बच्चे बोलते रहते हैं ।
इस स्थिति से बालक को कैसे बाहर निकाला जा सकता है?
मेरे पास ऐसे बहुत से बालक आये है और उन्हें मैंने शून्य से कक्षा में प्रथम स्थान तक भी पहुँचाया है । ज्यादातर मामलों में अंगेजी में उन्होंने पढ़ना बोलना सीख लिया है ऐसे कुल क्षात्रों की संख्या पचास हजार से ऊपर पहुँच चुकी है ।
मैं ऐसे छात्रों को हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद करना सिखाता हूँ यह कार्य पहले लिखित में या लिख कर करवाते हैं । लिख कर करवाने से स्पेलिंग्स में सुधार होता है और दूसरी सुविधा यह है कि क्षात्र आराम से सोच कर वाक्य बनाता है । फिर वाक्यों को चेक किया जाता है और उसकी गलतियों को बताया जाता है । धीरे धीरे उनकी स्पीड बढ़ जाती है । ग्रामर की सहायता से सही वाक्य कैसे बनायें यह समझाया जाता है । फिर वाक्य दिए जाते हैं और फिर वाक्य चेक किये जाते है और समझाया जाता है । धीरे धीरे वाक्यों को कठिन किया जाता है और उन्हें बनाना सिखाया जाता है एक वर्ष में यह कार्य पूरा होता है । एक वर्ष बाद बालक किसी भी स्थिति कि लिए तैयार हो जाता है।
कोचिंग्स में पढ़ने के बाद भी इस समस्या का हल क्यों नहीं मिलता ?
कई केस ऐसे भी मिले हैं जहाँ कई कोचिंग बदलने के बाद भी समस्या में ज्यादा सुधार नहीं हुआ । ऐसे मामले इसलिए सामने आते है क्योंकि कोचिंग में भीड़ रहती है । और क्षात्र केवल सुनते रहते हैं उन्हें कोई काम नहीं दिया जाता और फिर उसे चेक भी नहीं किया जाता खाली क्लास में बैठ कर टीचर को सुनने भर से कुछ नहीं होता स्पोकन इंग्लिश के नाम पर रटी हुई स्क्रिप्ट को बोल देने भर से इंग्लिश बोलना नहीं आता है । कई कई ऐसे क्षात्र भी मिले जो क्लास XII में हैं और स्पोकन इंग्लिश के नाम पर अपने इंट्रोडक्शन के नाम पर चार वाक्य से ज्यादा नहीं बोल सकते ।
आप कैसे अपने बच्चे को चेक कर सकते हैं कि उसमे यह समस्या हैं ?
1. आप उसकी किसी किताब की टेक्स्ट दें और उसे इसका हिंदी में मतलब बताने को बोलें । वह स्पष्ट रूप से बताने में असफल होगा तो आपको अंदाजा लग जायेगा । सामाजिक विज्ञानं की टेक्स्ट को जरूर दें ।
2. एक हिंदी की कहानी दें । उसे पढ़ने को कहें फिर उसे अंग्रेजी में बोलने को कहें आपको अंदाज हो जाएगा कि आपके बालक का स्तर क्या हैं ।
ध्यान रहे हम ऐसी ही समस्या को ठीक करते हैं ।
आप सुधार के लिए क्या कर सकते हैं ?
1. आप अपने सामने बच्चे को उसके विषय कि खास कर सामजिक विज्ञान की टेक्स्ट को पढ़वायें और उसकी मीनिंग या अर्थ हिंदी में बताने को कहें और गलत होने पर उसका सही अर्थ बताएं ।
2. आपके घर में कम से कम तीन डिक्शनरी होना चाहिए । 1. इंग्लिश से हिंदी 2. हिंदी से इंग्लिश 3. English to इंग्लिश और अपने बच्चे में डिक्शनरी को प्रयोग करने की आदत डालें या अपने मोबाइल फ़ोन से ही मीनिंग देखे ।
3. छोटे छोटे हिंदी के वाक्य दें और उनकी अंग्रेजी पूछें । धीरे धीरे स्तर बढ़ाते हुए आगे बढ़ें और धीरे धीरे कठिन और लम्बे वाक्य दें फिर पैराग्राफ देना शुरू करें ।
अगर आप से काम न बने तो हमारी सेवा लें । ऑनलाइन या ऑफलाइन दोनों प्रकार की सुविधा उपलब्ध हैं।
ध्यान रहे हिंदी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों का विषय ज्ञान ज्यादा बेहतर होता है क्योंकि वह हर विषय जैसे विज्ञानं गणित सामाजिक विज्ञान को हिंदी में समझता है क्योंकि हर विषय हिंदी में पढ़ाया जाता है । उसके प्रतियोगी परीक्षाओं ने सेलेक्ट होने के चांस ज्यादा होते बजाय उस बच्चे के भाषा से जूझ रहा है ।
अगर आपका का बालक इंग्लिश medium में पढ़ रहा है तो आपको कुछ और बातों का ध्यान रखना पड़ेगा ।
1. क्या आपका बालक क्लास में टीचर को सुनता है । कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने बगल वाले से बात करने में ही व्यस्त रहता है आज कल पेरेंट्स के दबाव में टीचर स्टूडेंट्स को कुछ नहीं बोलते चाहे वे बात करें या पढ़ें क्योंकि वे डरते हैं कि पेरेंट्स से शिकायत न हो जाये और पेरेंट्स जब शिकायत करते हैं तो मैनेजमेंट पेरेंट्स के साथ ही होता है लेकिन अगर आप का बालक बातचीत में व्यस्त रहता है तो वह पढाई से कट जायेगा । केवल क्लास में बैठना ही पढ़ना नहीं होता है । अगर ऐसा है तो बालक की इंग्लिश भी कमजोर हो सकती है ।
2. अगर आपने कोई टीचर लगा रखा है तो टीचर पहले से लेसन पढ़ा देता है तो कई बार बालक इसलिए टीचर को नहीं सुनता क्योंकि वह समझता है कि उससे यह लेसन बनता है यह भी अच्छी आदत नहीं है ।